उस अर्धनग्न सत्य की कुरूपता
मिथ्या की सबलता, सुन्दरता
अनकही बातो की पूर्णता और गालियों की मधुरता
क्यों सिमित हो गयी इतनी सांसारिक भाषा की परिभाषा
अंतर्ज्ञान इतना छोटा हो गया, बची है बस माया की अभिलाषा
शब्द अब भारहीन है, जेब हो गयी है भारी
अधिकारों की लड़ाई में कर्त्तव्य बस कुछ का है आभारी
तर्क की क्षुब्द , क्षीण शक्ति... वर्चस्व है असहज प्रवृतियों का
मानस पटल की संकुचित धुरी, व्यापकता है असंगत अभिव्यकित्यों का
रिश्तो की डोर झुकी जा रही है अपेक्षाओं के बोझ पे
कामुकता के आईने से निकली छवि आच्छादित है सबके सोच पे
सर्वव्यापी अब बस चार दीवारों में व्याप्त रह गया, भक्ति बस शक्ति में
धर्म एक नया व्यापर बन गया, है श्रद्धा समर्पित बस तृप्ति में
क्या आधुनिकता का भ्रम पहचान और संस्कृति की विकृति नहीं?
क्या इस रौशनी की चाह के पथ पर आखिरी पग अंधकारमय नहीं?
मानवता अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद से ही हारती जा रही है
इस सुस्व्पन की चिरकालीन निद्रा से मृत्युरूपी जीवन जागता जा रहा है.
मिथ्या की सबलता, सुन्दरता
अनकही बातो की पूर्णता और गालियों की मधुरता
क्यों सिमित हो गयी इतनी सांसारिक भाषा की परिभाषा
अंतर्ज्ञान इतना छोटा हो गया, बची है बस माया की अभिलाषा
शब्द अब भारहीन है, जेब हो गयी है भारी
अधिकारों की लड़ाई में कर्त्तव्य बस कुछ का है आभारी
तर्क की क्षुब्द , क्षीण शक्ति... वर्चस्व है असहज प्रवृतियों का
मानस पटल की संकुचित धुरी, व्यापकता है असंगत अभिव्यकित्यों का
रिश्तो की डोर झुकी जा रही है अपेक्षाओं के बोझ पे
कामुकता के आईने से निकली छवि आच्छादित है सबके सोच पे
सर्वव्यापी अब बस चार दीवारों में व्याप्त रह गया, भक्ति बस शक्ति में
धर्म एक नया व्यापर बन गया, है श्रद्धा समर्पित बस तृप्ति में
क्या आधुनिकता का भ्रम पहचान और संस्कृति की विकृति नहीं?
क्या इस रौशनी की चाह के पथ पर आखिरी पग अंधकारमय नहीं?
मानवता अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद से ही हारती जा रही है
इस सुस्व्पन की चिरकालीन निद्रा से मृत्युरूपी जीवन जागता जा रहा है.